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DNA: उद्धव-राज की भाईचार क्यों नहीं चला, उद्धव के पास मातोश्री ही बचा? Mumbai bmc election results

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आज राजनीति में ठाकरे शब्द ट्रेंड कर रहा है। इस ट्रेंडिंग की वजह विजय नहीं बल्कि ऐतिहासिक पराजय है। महाराष्ट्र के निकाय चुनाव के आज नतीजे आए हैं।
29 में से 25 नगर निगम में बीजेपी की अगुवाई वाले गठबंधन आगे है। बीजेपी ने नई और लंबी लकीर खींच दी है। बीजेपी खेमे में जश्न का माहौल है। लेकिन मातोश्री में आज उदासी है। जो ठाकरे सत्ता में ना होते हुए भी महाराष्ट्र की राजनीति की धुरी हुआ करते थे। जो ठाकरे केंद्र और राज्य के पावर सेंटर से दूरी के बावजूद सियासत और शक्ति के शिखर पर रहते थे। वो आज शून्य पर सिमट गए हैं।
जिस ठाकरे की एक आवाज़ पर मुंबई ठहर जाती थी। आज उसी ठाकरे को मुंबई ने ही किनारे कर दिया। देश की सबसे शक्तिशाली और धनवान नगरपालिका से भी ठाकरे की विदाई हो गई है। ठाकरे परिवार का सबसे मजबूत राजनीतिक किला आज ढह गया। जो ठाकरे कभी बीएमसी, राज्य और केंद्र की सत्ता में रहते थे, उनके पास अब सिर्फ मातोश्री ही बचा है। आज हम आपको बताएंगे कि उद्धव के अति महात्वाकांक्षी फैसले ने क्या वाकई मुंबई से "ठाकरे-राज" को खत्म कर दिया? बालासाहेब ठाकरे ने जो आभामंडल तैयार किया था, वो कैसे और क्यों मिटता जा रहा है? किसी भी तरह कुर्सी बचाने के लिए उद्धव-राज ने जो भाईचारा दिखाया था, वो भी क्यों मुंबई वालों को पसंद नहीं आया? 20 साल बाद राज ठाकरे की शिवसेना परिवार में वापसी के बावजूद 30 साल की सत्ता क्यों नहीं बच पाई? और ऐसा क्यों हुआ..कि आज उद्धव ठाकरे के पास दिखाने और बताने को..मातोश्री के अलावा और कुछ नहीं बचा।इन सभी सवालों का जवाब आज आप डीएनए में जानेंगे। लेकिन सबसे पहले आपको हम बताना चाहेंगे कि कैसे महाराष्ट्र की राजनीति आज 180 डिग्री पर आकर खड़ी हो गई है? महाराष्ट्र की 29 में से 25 महानगरपालिकाओं पर बीजेपी की अगुवाई वाली महायुति आगे है। पहली बार बीएमसी पर बीजेपी का कब्जा हुआ है। 30 सालों में पहली बार ठाकरे परिवार बीएमसी से बाहर हुआ है। उद्धव और राज ठाकरे का भाईचारा काम नहीं आया। और मुस्लिम बहुल इलाकों में AIMIM का असर दिखा है।
जो हुआ उसका सारांश ये है कि 30 साल में पहली बार ठाकरे परिवार पूर्ण रूप से सत्ताविहीन हो गया है। ठाकरे परिवार के पास मुंबई में कुछ नहीं बचा। जिस बीएमसी की बदौलत वो कभी कांग्रेस, एनसीपी और अब बीजेपी से टकरा रहे थे, वो आखिरी आधार भी चला गया। जो ठाकरे परिवार बाला साहेब के रहते एक नहीं हुआ, वो एक हो गया। मराठी मान, मुंबई की पहचान और स्थानीय अधिकार को चुनाव से जोड़ा। बाहरी बनाम स्थानीय का भावनात्मक मुद्दा बार-बार उठाया। लेकिन कुछ काम नहीं आया।

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समाचार - News
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dna with Rahul Sinha, Mumbai bmc election results, Mumbai BMC Election Results
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